आपको याद ही होगा कि थोड़े ही दिन पहले मैं ३ महीने का हुआ हूँ। मेरे ३ महिने के होने का और किसी को हो ना हो मुझे तो कम से कम एक फ़ायदा हो ही गया है कि अब मुझे फ़लों का रस, दाल का पानी, चावल का पानी वगैरह मिला करेगा :) ऐसा मैने सुना है मम्मा डैडू और आजी को बात करते हुए।
संयोग से मेरे मामा पुणे आने वाले थे मेरा मुँह झुठा करवाने के लिए (और अपने ऑफ़ीस के काम से भी)। अरे यार यह एक रस्म होती है, जिसे उष्टावण कहते हैं। जब मम्मा बता रही थी डैडू को तब मैं भी तो वहीं था, मैं तो तब से ही इंतजार कर रहा था मामा का, वह भी बड़ी बेसब्री से, क्योंकि मुझे तो ये सब चखना था ना! पता तो नहीं था कि ये सब क्या है? बस इतना पता चल चुका था कि यह मेरे लिये कुछ नया खाने-पीने की रस्म है।
हम लोग (यानि कि मम्मा-डैडू सुबह से इंतजार कर रहे थे - मैं तो 'सो' रहा था) आखिरकार मामा आ ही गये और मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा...। आप लोग बोलेंगे मुझे कैसे पता चला - अरे मुझे फ़टाफ़ट जगा दिया था ना। उनके आते ही घर में भगदड मच गयी थी..... इतनी जल्दी मचा रहे थे कि क्या बताऊँ...??!!?? मैं तो सिर्फ़ सबको इधर से उधर जाते हुए देख रहा था और सोच रहा था कि आखिर ये हो क्या रहा हैं? फ़िर पता चला कि मामा को शायद किसी मीटिंग में जाना था और उन्हें देर हो रही थी।
फ़िर वो समय आ ही गया...! मुझे मम्मा ने मामा की गोदी में दिया, मामा ने एक हाथ से मुझे सम्हाला और दूसरे हाथ से एक चम्मच। फ़िर कटोरी में से कुछ भरा और आखिरकार वो चीज मेरे मुँह में आ ही गई। लाल लाल रंगा का कुछ था, पहले तो मुझे लगा कि कोई दवाई है। इसके पहले मैं दवाई का स्वाद ले चुका था ना। इसलिये पहले तो मुँह से ही निकाल दिया। मगर यह दवाई नहीं थी। मामा ने फ़िर से मेरे मुँह में भर दिया। कुछ खट्टा-सा, कुछ मीठा-सा, पता है वो क्या था? यिप्प्प्प्पी वो था अनार का रस! पर ये अनार क्या होता है? पर जो भी था मजेदार था। एक नया स्वाद जो हर पल रहेगा याद...!
खैर, इंतजार खत्म हुआ, और फ़िर तो जैसे सबको मौका ही चाहिये था। आजी, मम्मा, डैडू और यहाँ तक कि विदुला ताई तक ने मुझे रस पिलाया। पर बिल्कुल थोड़ा-थोड़ा। किसी को भी ऐसा नहीं लगा कि मुझे और पीने देना चाहिए और ऐसा भी नहीं था कि रस खत्म हो गया था। पर सब के सब कंजुस हैं ना। खैर, जाने भी दो अब। फ़िर मामा ने मेरे हाथ में एक कागज का टुकड़ा अटका दिया और मेरा ध्यान बँट गया। मैं उसे हिला हिला कर खुश हो रहा था। फ़िर उसके बाद एक छोटा सा फ़ोटो सैशन भी हुआ। सब लोगों ने मेरे साथ फ़ोटो खिंचवाए। देखो देखो आप लोग भी देखो।
और हाँ, जाने से पहले मम्मा और डैडू से जरुर कहना कि वो मुझे अनार का और रस पिलायें। बोलेंगे ना??
अब देखिये कुछ चुनिंदा फ़ोटो:
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Wednesday, August 5, 2009
Thursday, July 30, 2009
मैं हो गया ३ महीने का!
आज मैं हो गया हूँ पूरे तीन महीने का।
मेरे अब तक के सफ़र के कुछ फ़ोटो आप आज देखिये। मुझे तो पता है कि ये बहुत थोड़े से हैं, पर क्या करूँ? डैडू कल रात को फ़ोटो अपलोड करने वाले थे, मम्मा ने बहुत सारे फ़ोटो निकाल भी लिये थे चुन चुन कर पर डैडू आये ही बहुत लेट। फ़िर रात को तो कुछ काम कर नहीं पाये। सो आज सुबह चले करने को।
ये ब्लाग-स्पाट ने भी पूरी तैयारी कर रखी थी डैडू को तंग करने की। एक तो सिर्फ़ ५ फ़ोटो एक साथ अपलोड कर सकने देता है, फ़िर कितना धीरे धीरे अपलोड होता है, और फ़िर जब फ़ोटो अपलोड हो जाते थे, और डैडू "Done" क्लिक करते थे तो ५ में से कभी २ कभी १ ही फ़ोटो पोस्ट में दिख रहे थे।
(श्श्श्श्श...डैडू बहुत बार #$@$#% हो रहे थे ही ही ही)
खैर, जाने दीजिये। आप तो खत को तार और थोड़े को बहुत समझिये, और ये फ़ोटो देखिये:
मेरे अब तक के सफ़र के कुछ फ़ोटो आप आज देखिये। मुझे तो पता है कि ये बहुत थोड़े से हैं, पर क्या करूँ? डैडू कल रात को फ़ोटो अपलोड करने वाले थे, मम्मा ने बहुत सारे फ़ोटो निकाल भी लिये थे चुन चुन कर पर डैडू आये ही बहुत लेट। फ़िर रात को तो कुछ काम कर नहीं पाये। सो आज सुबह चले करने को।
ये ब्लाग-स्पाट ने भी पूरी तैयारी कर रखी थी डैडू को तंग करने की। एक तो सिर्फ़ ५ फ़ोटो एक साथ अपलोड कर सकने देता है, फ़िर कितना धीरे धीरे अपलोड होता है, और फ़िर जब फ़ोटो अपलोड हो जाते थे, और डैडू "Done" क्लिक करते थे तो ५ में से कभी २ कभी १ ही फ़ोटो पोस्ट में दिख रहे थे।
(श्श्श्श्श...डैडू बहुत बार #$@$#% हो रहे थे ही ही ही)
खैर, जाने दीजिये। आप तो खत को तार और थोड़े को बहुत समझिये, और ये फ़ोटो देखिये:
Wednesday, July 22, 2009
यू.एस. शिफ़्ट
वैसे तो मैं रात को 'कभी-कभी' सो भी जाता हूँ, मगर जब मेरा पुरी तरह जागने का मूड होता है ना तो फ़िर बस्स...
अब डैडू तो मुझे रात को ही दिखते हैं। अरे मेरा मतलब है कि सुबह जब वो ऑफ़ीस जाते हैं तो उस वक्त तो मैं गहरी नींद में रहता हूँ ना। मुझे कैसे पता?? अरे मम्मा बताती हैं ना मुझे दिन में।
तो जब डैडू रात को मेरे पास आते हैं तो मेरा फ़र्ज बनता है ना कि मैं "उन्हें पुरा अटेण्ड" करूँ।
जब तब वो खाना खाते हैं तब तक तो मैं अपना खाना खतम कर के एक छोटी सी नींद निकाल लेता हूँ। बस, फ़िर जब मैं उठता हूँ तो फ़िर मजा आता है।
डैडू चुपचाप से सोने की तैयारी करते रहते हैं और मैं उन्हें पकड़ लेता हूँ।
एक बार जो चढता हूँ उनके कंधे पर, फ़िर मुझे वहाँ से उतार के देख लो। मैं इतना उन्हें "ऊँऊँऊँआँ..ऊँऊँऊँआँ.." करके सुनाता हूँ कि वो बिचारे मुझे उतारने का सोचते तक नहीं।
ही ही ही ..बड़ा मजा आता है, जब वो मुझे उठा कर चहलकदमी करते रहते हैं।
हाँ, फ़िर होता ये है कि बाबा डैडू की मदद को चले आते हैं। उनकी गोद में मुझे भी बड़ा अच्छा लगता है, और वो तो कभी मुझसे नहीं थकते। चाहे कितनी ही रात क्यों ना हो। उनकी गोद में घुम घुम कर जब मैं थक जाता हूँ तब मुझे कब नींद आ जाती है, पता ही नहीं चलता।
सब लोग मुझे कहते हैं कि मैं गलत देश में पैदा हो गया हूँ। मेरे नींद और जागने के कार्यक्रम से तो लगता है कि मुझे यू.एस. में होना चाहिये था।
मम्मा-डैडू तो बोलते भी है कि मैं यू.एस. शिफ़्ट में काम करता हूँ। ही ही ही।
अब डैडू तो मुझे रात को ही दिखते हैं। अरे मेरा मतलब है कि सुबह जब वो ऑफ़ीस जाते हैं तो उस वक्त तो मैं गहरी नींद में रहता हूँ ना। मुझे कैसे पता?? अरे मम्मा बताती हैं ना मुझे दिन में।
तो जब डैडू रात को मेरे पास आते हैं तो मेरा फ़र्ज बनता है ना कि मैं "उन्हें पुरा अटेण्ड" करूँ।
जब तब वो खाना खाते हैं तब तक तो मैं अपना खाना खतम कर के एक छोटी सी नींद निकाल लेता हूँ। बस, फ़िर जब मैं उठता हूँ तो फ़िर मजा आता है।
डैडू चुपचाप से सोने की तैयारी करते रहते हैं और मैं उन्हें पकड़ लेता हूँ।
एक बार जो चढता हूँ उनके कंधे पर, फ़िर मुझे वहाँ से उतार के देख लो। मैं इतना उन्हें "ऊँऊँऊँआँ..ऊँऊँऊँआँ.." करके सुनाता हूँ कि वो बिचारे मुझे उतारने का सोचते तक नहीं।
ही ही ही ..बड़ा मजा आता है, जब वो मुझे उठा कर चहलकदमी करते रहते हैं।
हाँ, फ़िर होता ये है कि बाबा डैडू की मदद को चले आते हैं। उनकी गोद में मुझे भी बड़ा अच्छा लगता है, और वो तो कभी मुझसे नहीं थकते। चाहे कितनी ही रात क्यों ना हो। उनकी गोद में घुम घुम कर जब मैं थक जाता हूँ तब मुझे कब नींद आ जाती है, पता ही नहीं चलता।
सब लोग मुझे कहते हैं कि मैं गलत देश में पैदा हो गया हूँ। मेरे नींद और जागने के कार्यक्रम से तो लगता है कि मुझे यू.एस. में होना चाहिये था।
मम्मा-डैडू तो बोलते भी है कि मैं यू.एस. शिफ़्ट में काम करता हूँ। ही ही ही।
Wednesday, July 8, 2009
ये कौन खट-पट कर रहा है?
एक बड़ी अजीब बात नोटिस कर रहा हूँ कि जबसे हम लोग पुणे आये हैं, उसके दूसरे ही दिन से डैडू रोज सुबह सुबह उठ कर खटर-पटर करते हैं, और फ़िर तैयार होकर कहीं निकल जाते हैं।
एक तो मैं वैसे ही रोज रात को उन्हे (ज्यादातर तो मम्मा को) जगाकर रहता हूँ। वो क्या है ना कि मुझे रोज रात को उठने के बाद मम्मा/बाबा/आजी की गोदी में चढकर उन्हें नाईटवॉक करवाना बहुत पसंद है।
अगर वो लोग मुझसे बचने की कोशिश करते हैं और मुझे चुपचाप से पलंग पर लिटा देते हैं तो मैं फ़टाक से जान जाता हूँ और ...फ़िर आप तो समझते ही होंगे कि अगर मुझे ये पता चला तो मैं क्या करुंगा।
अरे फ़िर क्या, उन्हें मुझे उठाना ही पड़ता है। ही ही ही।
तो भई, अब सुबह सुबह तो मैं सोता रहता हूँ कि कुछ खटर-पटर से मेरी नींद खुल जाती है। डैडू दिखते हैं कुछ तैयारी करते हुये। फ़िर कहीं निकल जाते हैं। उसके बाद तो वो मुझे रात को ही नजर आते हैं।
मुझे मम्मा ने तो बताया था कि डैडू का ऑफ़ीस ९:३०-१०:०० बजे से होता है फ़िर ये डैडू ६:३० बजे से किधर निकल जाते हैं?
हाँ याद आया, मम्मा ने बताया था कि डैडू फ़ुटबाल खेलते हैं। पर वो तो काफ़ी दिनों से बंद है। और वैसे भी डैडू फ़ुटबाल के गेटअप में तो नहीं जाते।
सो बहुत सर खुजाने के बाद अब पता चला कि डैडू के सर पर गॉल्फ़ का भूत चढा है। और वो सुबह सुबह गॉल्फ़ सीखने जा रहे हैं। वो भी ऐसे पता चला कि आने के बाद डैडू घर भर में सबको बताते फ़िरते हैं कि आज मैने ये किया, आज मैने वो किया, आज ये, आज वो..!
चलो, अच्छा है, सीख लें तो फ़िर हम भी बाद में उन्हीं से सीख लेंगे।
तब तक तो अपन बोलेंगे - मेरे डैडू को गॉल्फ़ आता है (यानि सीख रहे है)
एक तो मैं वैसे ही रोज रात को उन्हे (ज्यादातर तो मम्मा को) जगाकर रहता हूँ। वो क्या है ना कि मुझे रोज रात को उठने के बाद मम्मा/बाबा/आजी की गोदी में चढकर उन्हें नाईटवॉक करवाना बहुत पसंद है।
अगर वो लोग मुझसे बचने की कोशिश करते हैं और मुझे चुपचाप से पलंग पर लिटा देते हैं तो मैं फ़टाक से जान जाता हूँ और ...फ़िर आप तो समझते ही होंगे कि अगर मुझे ये पता चला तो मैं क्या करुंगा।
अरे फ़िर क्या, उन्हें मुझे उठाना ही पड़ता है। ही ही ही।
तो भई, अब सुबह सुबह तो मैं सोता रहता हूँ कि कुछ खटर-पटर से मेरी नींद खुल जाती है। डैडू दिखते हैं कुछ तैयारी करते हुये। फ़िर कहीं निकल जाते हैं। उसके बाद तो वो मुझे रात को ही नजर आते हैं।
मुझे मम्मा ने तो बताया था कि डैडू का ऑफ़ीस ९:३०-१०:०० बजे से होता है फ़िर ये डैडू ६:३० बजे से किधर निकल जाते हैं?
हाँ याद आया, मम्मा ने बताया था कि डैडू फ़ुटबाल खेलते हैं। पर वो तो काफ़ी दिनों से बंद है। और वैसे भी डैडू फ़ुटबाल के गेटअप में तो नहीं जाते।
सो बहुत सर खुजाने के बाद अब पता चला कि डैडू के सर पर गॉल्फ़ का भूत चढा है। और वो सुबह सुबह गॉल्फ़ सीखने जा रहे हैं। वो भी ऐसे पता चला कि आने के बाद डैडू घर भर में सबको बताते फ़िरते हैं कि आज मैने ये किया, आज मैने वो किया, आज ये, आज वो..!
चलो, अच्छा है, सीख लें तो फ़िर हम भी बाद में उन्हीं से सीख लेंगे।
तब तक तो अपन बोलेंगे - मेरे डैडू को गॉल्फ़ आता है (यानि सीख रहे है)
Wednesday, July 1, 2009
मैं हूँ प्रांजय
नमस्कार! सलाम! सत श्री'काल। हैल्लो!
मैने आज ही से ब्लागिंग शुरु की है। मेरे डैडू ने कल ही मेरा पहला इमेल पता और ब्लाग बनाया है ताकि मैं आप सबसे बातें कर सकूँ। आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि मैं अभी बहुत छोटा हूँ, सच्ची, इसीलिये मेरे बदले या तो डैडू या फ़िर मम्मा मेरी बातें लिखेंगी। पर सिर्फ़ तब तक जब तक कि मैं खुद लिखने लायक बड़ा ना हो जाउँ।
वैसे अभी क्या पुछ रहे थे आप? मैं कितना छोटा हूँ? अरे वो तो मैने यूँही कह दिया था, मैं तो बड़ा हो चुका हूँ। आज इस दुनियाँ में, अपने मम्मा-डैडू, दादा-दादी, नाना-नानी, काका-काकू, शाशा माउशी, प्यारी सी विदुला ताई, बाकि परिवार वालों और आप सब के पास आकर मुझे पूरे दो महीने और एक दिन हो चुके हैं।
जी हाँ मेरा जन्मदिन है: ३० एप्रिल २००९
मैं तो कल से ही लिखना चाहता था, पर क्या है ना कि डैडू को समय नहीं मिला, पर कोई बात नहीं, लेट लिखने के लिये मैं उन्हें माफ़ करता हूँ। (अभी तो उन्हें पटा कर रखना पडेगा ना, आखिर अभी ब्लाग उन्हीं से जो लिखवाना है)
वैसे यह इमेल और ब्लाग मेरा दूसरे महीने वाले बड्डे का गिफ़्ट है। हाँ।
तो मैं अभी चलता हूँ और फ़िर यहीं आप लोगों से मिलता रहुँगा।
आप लोग भी मुझसे मिलने आते रहना, ठीक है?? आओगे ना??
प्रायवेट बात: मेरे डैडू बहुत आलसी हैं, मेरे ब्लाग को अच्छे से सजा ही नहीं रहे। आप लोग उन्हें आयडिये दो ना अच्छे-अच्छे।
मैं हूँ प्रांजय!
मैने आज ही से ब्लागिंग शुरु की है। मेरे डैडू ने कल ही मेरा पहला इमेल पता और ब्लाग बनाया है ताकि मैं आप सबसे बातें कर सकूँ। आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि मैं अभी बहुत छोटा हूँ, सच्ची, इसीलिये मेरे बदले या तो डैडू या फ़िर मम्मा मेरी बातें लिखेंगी। पर सिर्फ़ तब तक जब तक कि मैं खुद लिखने लायक बड़ा ना हो जाउँ।
वैसे अभी क्या पुछ रहे थे आप? मैं कितना छोटा हूँ? अरे वो तो मैने यूँही कह दिया था, मैं तो बड़ा हो चुका हूँ। आज इस दुनियाँ में, अपने मम्मा-डैडू, दादा-दादी, नाना-नानी, काका-काकू, शाशा माउशी, प्यारी सी विदुला ताई, बाकि परिवार वालों और आप सब के पास आकर मुझे पूरे दो महीने और एक दिन हो चुके हैं।
जी हाँ मेरा जन्मदिन है: ३० एप्रिल २००९
मैं तो कल से ही लिखना चाहता था, पर क्या है ना कि डैडू को समय नहीं मिला, पर कोई बात नहीं, लेट लिखने के लिये मैं उन्हें माफ़ करता हूँ। (अभी तो उन्हें पटा कर रखना पडेगा ना, आखिर अभी ब्लाग उन्हीं से जो लिखवाना है)
वैसे यह इमेल और ब्लाग मेरा दूसरे महीने वाले बड्डे का गिफ़्ट है। हाँ।
तो मैं अभी चलता हूँ और फ़िर यहीं आप लोगों से मिलता रहुँगा।
आप लोग भी मुझसे मिलने आते रहना, ठीक है?? आओगे ना??
प्रायवेट बात: मेरे डैडू बहुत आलसी हैं, मेरे ब्लाग को अच्छे से सजा ही नहीं रहे। आप लोग उन्हें आयडिये दो ना अच्छे-अच्छे।
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